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​चिंतन बढ़े तो चिंता घटे …!!

Posted On 13 Apr, 2016 Hindi Sahitya में

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​चिंतन बढ़े तो चिंता घटे …!!
तारकेश कुमार ओझा
चिंता और चिंतन की दुनिया भी अजीब है।
हर इंसान की चिंता अलग – अलग होती है। जैसे कुछ लोगों की चिंता का विषय होता है कि फलां अभिनेता या अभिनेत्री अभी तक शादी क्यों नहीं कर रहा या रही। या फिर अमुक जोड़े के बीच अब पहले जैसा कुछ है या नहीं। एक समूह की चिंता आइपीएल और क्रिकेट मैचों की इर्द – गिर्द ही घूमा करती है। अक्सर क्रिकेट के खेल में मिली जीत या हार के बाद चैनलों के लिए समय मानो ठहर सा जाता है।
घंटों बस क्रिकेट पर बहस। जीत गए तो बल्ले – बल्ले , हार गए तो लगे पराजय का पोस्ट मार्टम करने।
अच्छी बात है कि तमाम तनाव के बावजूद इस पोस्टमार्टम में अब पड़ोसी देश पाकिस्तान के विशेषज्ञ औऱ पूर्व खिलाड़ी भी शामिल होने लगे हैं।
खैर जो हो क्रिकेट व आइपीएल मैचों को लेकर घंटों चिंतन और चिंता का दौर चलता रहता है। दूसरे सारे काम या यूं कहें कि खबरें रोक दी जाती है।
कुछ लोगों की चिंता तो और भी विचित्र होती है।
समाज के एक व र्ग की चिंता जब – तब इस रूप में सामने आती रहती है कि फलां अरबपति खिलाड़ी इस बार कमाई के मामले मेें पीछे कैसे रह गया। क्या उसे अब पहले की तरह विज्ञापन नहीं मिल रहे । या फिर नवोदित खिलाड़ी उसे पीछे छोड़ रहे हैं।
कुछ राजनेता इस चिंता में दुबले हुए जाते हैं कि समाज के एक वर्ग को देशभक्ति साबित करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
कंगाली के कगार पर पहुंच चुके एक जमींदार देनदारी की चिंता में डूबे थे, जबकि उनके सामने सेविंग कर रहे उनके छोटे भाई की चिंता थी कि उसकी मुंछे करीने से बन पाई है या नहीं।
गांव में बड़े – बुर्जुर्गों की चिंताएं विडंबना से कम नहीं होती।
कुनबे के सदस्य दुनियावी चिंताओं से ग्रस्त हैं।लेकिन बुजुर्गों को इस बात की चिंता है कि उनके मरने के बाद नई पीढ़ी उनका कायदे से श्राद्ध और ब्रह्म भोज करेगी या नहीं। ज्यादातर बड़े – बुजुर्ग इसी चिंता में दुबले हुए जाते हैं।
अनेक बुजु र्गों को घर की तंग माली हालत के बावजूद परिवार में कोई बड़ा और खर्चीला आयोजन कराने की चिंता होती है। इस चिंता को दूर करने के लिए अपने स्तर पर वे मनोवैज्ञानिक प्रयास करते रहते हैं। भले ही इसमें परिवार आ र्थिक दृष्टि सं पंगु ही क्यों न हो जाए।
देश के मामले में भी अक्सर तरह – तरह की चिंताएं सामने आती रहती है।
अभी चैनलों पर लातूर समेत देश के कई भागों मेें उत्पन्न हो रही पेयजल की भयंकर समस्या पर दिखाई जा रही रिपोर्टिंग से मेरी चिंता बढ़ रही थी।
तभी एक बाबा का बयान आया कि फलां भगवान नहीं बल्कि ग्रह है।
इससे पहले भी यह बाबा घोर संकट के दौर में ऐसे बयान देते रहते हैं। जिसका सार यही होता है कि फलां कोई भगवान नहीं। अमुक की पूजा नहीं की जानी चाहिए। उसकी पूजा करना गलत है।
फिर शुरू होता है चैनलों पर बहस का दौर।
… क्या फलां बाबा का यह कहना सही है। क्या आप इससे सहमत हैं। सहमत हैं या एस और यदि असहमत हैं तो ए लिख कर हमें एसएमएस करें।बहस करने वालों में भी गजब का संतुलन है। चार में दो लोग बाबा का विरोध करते हैं वहीं दो घुमा – फिरा कर यह साबित करना चाहते हैं कि बाबा के कहने का मतलब यह नहीं था।
यह बहस तब तक चलती रहती है जब तक कि नए विवाद का कोई मुद्दा हाथ न लग जाए। बेशक अपने पल्ले भले कुछ न पड़े। लेकिन चिंतन बढ़ा कर कुछ चालाक लोग अपनी चिंता जरूर कम करने में कामयाब होते रहे हैं।
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Web Title : ​चिंतन बढ़े तो चिंता घटे ...!!

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
April 20, 2016

अच्छा व्यंग्य किया है आपने । जो कहा है, बिलकुल सटीक कहा है । अभिनंदन ।


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