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झिझक मिटे तो हिंदी बढ़े ...!!

Posted On: 10 Sep, 2016 Social Issues में

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​हिंदी दिवस के लिए विशेषः
———————-
झिझक मिटे तो हिंदी बढ़े …!!
तारकेश कुमार ओझा

एक बार मुझे एक ऐसे समारोह में जाना पड़ा, जहां जाने से मैं यह सोच कर कतरा रहा था कि वहां अंग्रेजी का बोलबाला होगा। सामान्यतः ऐसे माहौल में मैं सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता। लेकिन मन मार कर वहां पहुंचने पर मुझे अप्रत्याशित खुशी और सुखद आश्चर्य हुआ। क्योंकि ज्यादातर वक्ता भले ही अहिंदी भाषी और ऊंचे पदों को सुशोभित करने वाले थे, लेकिन समारोह के शुरूआत में ही एक ने हिंदी में भाषण क्या शुरू किया प्रबंधक से लेकर प्रबंध निदेशक तक ने पूरा भाषण हिंदी में प्रस्तुत किया। बात वहां मौजूद हर छोटे – बड़े के हृदय तक पहुंची। इस घटना ने मेरी धारणा बदल दी। मुझे लगा कि अंग्रेजीदां समझे जाने वाले लोग भी हिंदी पसंद करते हैं और इस भाषा में बोलना चाहते हैं। लेकिन अक्सर वे बड़े समारोह जहां ऊंचों पदों को सुशोभित करने वाले लोग मौजूद हों हिंदी बोलने से यह सोच कर कतराते हैं कि यह शायद उन्हें पसंद न आए। जीवन प्रवाह में मुझे इस तरह के कई और अनुभव भी हुए। मसलन मैं एक नामी अंग्रेजी स्कूल के प्राचार्य कक्ष में बैठा था। स्वागत कक्ष में अनेक पत्र – पत्रिकाएं मेज पर रखी हुई थी। जिनमें स्कूल की अपनी पत्रिका भी थी। जो थी तो अंग्रेजी में लेकिन उसका नाम था शैशव। इससे भी सुखद आश्चर्य हुआ। क्योॆंकि पूरी तरह से अंग्रेजी वातावरण से निकलने वाली अंग्रेजी पत्रिका का नाम हिंदी में था। बेशक इसके प्रकाशकों ने हिंदी की ताकत को समझा होगा। इस घटना से भी मैं गहरे सोच में पड़ गया कि आखिर क्या वजह है कि बड़े – बड़े कारपोरेट दफ्तरों व शॉपिंग मॉलों में भी रोमन लिपि में ही सही लेकिन हिंदी के वाक्य कैच वर्ड के तौर पर लिखे जाते हैं। जैसे.. शादी में अपनों को दें खास उपहार… खास हो इस बार आपका त्योहार… शुभ नववर्ष… शुभ दीपावली… हो जाए नवरात्र पर डांडिया … वगैरह – बगैरह। यही नहीं सामुदायिक भवनों के नाम भी मांगलिक आर्शीवाद, स्वागतम तो बड़े – बड़े आधुनिक अस्पतालों का नामकरण स्पंदन, नवजीवन , सेवा – सुश्रषा होना क्या यह साबित नहीं करता कि बोलचाल में हम चाहे जितनी अंग्रेजी झाड़ लें लेकिन हम भारतीय सोचते हिंदी में ही है। क्या इसलिए कि अंग्रेजीदां किस्म के लोग भी जानते हैं कि बाहर से हम चाहे जितना आडंबर कर लें लेकिन हिंदी हमारे हृदय में बसती है। मुझे लगता है हिंदी की राह में सबसे बड़ी रुकावट वह झिझक है जिसकी वजह से उच्चशिक्षित माहौल में हम हिंदी बोलने से कतराते हैं। जबकि किसी भी वातावरण में अब हिंदी के प्रति दुर्भावना जैसी कोई बात नहीं रह गई है। अपने पेश के चलते मुझे अक्सर आइआइटी जाना पड़ता है। बेशक वहां का माहौल पूरी तरह से अंग्रेजी के रंग में रंगा होता है। लेकिन खास समारोह में जब भी मैने किसी संस्थान के छात्र या अन्य प्राध्यापकों से हिंदी में बातचीत की तो फिर माहौल बनता चला गया। यह तो हमारी झिझक है जो हम अपनी भाषा में बात करने से कतराते हैं। आइआइटी के ही एक कार्यक्रम में एक अति विशिष्ट हस्ती मुख्य अतिथि थे। जो दक्षिण भारतीय पृष्ठभूमि के तो थे ही उनकी अंतर राष्ट्रीय ख्याति भी थी। उनके संभाषण से पहले एक हिंदी देशभक्ति गीत बजाया गया तो उन्होंने अपने संभाषण की शुरूआत में ही इस गीत का विशेष रूप से उल्लेख किया। ऐसे में हम कैसे कह सकते हैं कि आज के दौर में किसी को हिंदी से परहेज है .या कहीं हिंदी सीखने – सिखाने की आवश्यकता है। अपने पेशे के चलते ही मुझे अनेक नामचीन लोगों के मोबाइल पर फोन करना पड़ता है जिनमें देश के विभिन्न प्रांतो के लोग होते हैं। लेकिन मैने ज्यादातर अहिंदीभाषी विशिष्ट हस्तियों का कॉलर टोन हिंदी में पाया। बेशक कुछ हिंदी भाषियों के मोबाइल पर अहिंदीभाषी गानों की धुन टोन के रूप में सुनने को मिली। भाषाई उदारता और देश की एकता की दृष्टि से इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। दरअसल हीन ग्रंथि हमारे भीतर है । हम सोचते हैं कि उच्च शिक्षित और पढ़े लिखे लोगों के बीच मैं यदि भारतीय भाषा में बात करुंगा तो वहां मौजूद लोगों को अजीब लगेगा।लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है।हमें अपनी इस झिझक से पार पाना ही होगा। मुझे याद आता है श्री हरिकोटा में प्रधानमंत्री का हिंदी में दिया गया वह भाषण जिसे वहां मौजूद वैज्ञानिक पूरी तन्मयता से सुनते रहे। फिर भाषाई वैशिष्टय या संकीर्णता को लेकर हम आधारहीन शिकायत क्यों करें।

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

achyutamkeshvam के द्वारा
September 19, 2016

साप्ताहिक सम्मान के लिए अभिनंदन … श्रेष्ठ आलेख

Jitendra Mathur के द्वारा
September 17, 2016

आपके लेख में प्रस्तुत विचार पूर्णरूपेण सहमति योग्य हैं तारकेश जी । साप्ताहिक सम्मान के लिए अभिनंदन आपका ।

jlsingh के द्वारा
September 16, 2016

aap bilkul sahee kah rahe hain! hame hindi bolane me jhijhak nahee honee chahiye!

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
September 16, 2016

अंग्रेजी प्रिय भारतीय अपने बच्चों के नाम संस्क्रत से रखने लगे हैं । ओझा जी अच्छा आत्म संतोष ओम शांति शांति 


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